भगवान शिव के परिवार के बारे में हम सभी जानते हैं। उनकी पत्नी देवी पार्वती, पुत्र कार्तिकेय एवं गणेश तो प्रसिद्ध है ही, साथ ही साथ उनकी पुत्री अशोकसुन्दरी के बारे में भी जानने को मिलता है। इसके अतिरिक्त उनके अन्य चार पुत्रों (सुकेश, जालंधर, अयप्पा और भूमा) के विषय में भी पुराणों में जानकारी मिलती है। लेकिन क्या आपको महादेव की बहन के बारे में पता है? पुराणों और लोक कथाओं में भगवान शिव की बहन “असावरी देवी” के बारे में भी वर्णन मिलता है जिन्हे स्वयं महादेव ने देवी पार्वती के अनुरोध पर उत्पन्न किया था। तो आइये आज महादेव की बहन के विषय में जानते हैं। 

ये कथा कार्तिकेय और गणेश के जन्म से पहले की है। देवी सती की मृत्यु के पश्चात महादेव का विवाह देवी पार्वती से हुआ। महादेव के लिए माता ने समस्त वैभव को छोड़, कैलाश की कठिन जीवन शैली को अपनाना स्वीकार किया। उसके ऊपर से शिव महातपस्वी। सदैव साधना में लीन रहते थे। उनके ना कोई मित्र, ना सगे सम्बन्धी। इस नितांत अकेलेपन से कैलाश में देवी पार्वती का मन नहीं लगता था। वे सोचती कि अगर कोई सम्बन्धी यहाँ होते तो उनके साथ वार्तालाप कर उनका समय आसानी से कट सकता था। किन्तु महादेव तो स्वयंभू थे, फिर उनके कोई सम्बन्धी कैसे हो सकते थे? यही सोच कर वे दुखी रहा करती थी। उनके मनोभाव को देख कर महादेव ने कई बार उनसे उनकी चिंता के विषय में पूछा किन्तु देवी ने बात टाल दी। भोलेनाथ से भला क्या छिपा है? उन्होंने उनकी मन की बात जान ली। फिर एक दिन वे भी ये अड़ गए कि आखिर क्यों माता पार्वती इतनी उदास रहती है?
देवी पार्वती तो वैसे भी दुःख से भरी बैठी थी, अब पति द्वारा ये पूछने पर आखिरकार उन्होंने उन्हें अपनी वेदना बताई। शिव मुस्कुराये। पूछा कि वे कैसे सम्बन्धी की कामना करती हैं? तब पार्वती ने उत्साह से बताया – “स्वामी! अगर मेरी कोई ननद होती तो दोनों बहनें आपस में हंस-बोल लिया करती।” तब महादेव ने पूछा कि – “क्या तुम अपनी ननद के साथ निभा पाओगी।” तब देवी पार्वती ने कहा – “अवश्य। मैं उनकी इतनी सेवा करुँगी कि मनमुटाव का कोई प्रश्न ही नहीं आएगा।” तब महादेव ने हँसते हुए अपने तेज से स्त्री की रचना की। उन्होंने उसे “असावरी” नाम दिया और अपनी बहन के रूप में स्वीकार किया। असवारी देवी का स्वरुप बड़ा भयानक था। उनकी काया अत्यंत स्थूल, रंग काला, होंठ बड़े और लाल थे और उनके पैरों में बड़ी-बड़ी दरारें थी। उन्होंने उत्पन्न होते ही भगवान शिव को प्रणाम किया और उनसे अपनी उत्पत्ति का कारण पूछा। तब महादेव ने उनका परिचय देवी पार्वती से कराया और कहा कि अब दोनों बहनों की तरह प्रेम भाव से कैलाश में रहें।
उधर देवी पार्वती हालाँकि उनके इस विचित्र रूप से हैरान हुईं लेकिन फिर भी अब एक ननद को पा कर वे अत्यंत प्रसन्न थी। उन्होंने असावरी देवी को स्नान कराया और फिर स्वयं स्नान कर उनके लिए तरह-तरह के पकवान बनाये। फिर वे भोजन के लिए महादेव और शिवगणों को बुलाने गयी कि आज सब मिलकर भोजन करेंगे। जब वे वापस आयी तो उन्होंने देखा कि असावरी देवी ने सारा भोजन खा लिया था। शिवगण तो भूखे रहे ही, साथ ही महादेव के लिए भी खाने को कुछ नहीं बचा। ऐसा देख कर महादेव और सभी कैलाशवासी भूखे पेट वापस चले गए। अपने पति को इस प्रकार भूखे वापस जाते देख कर देवी पार्वती को बहुत बुरा लगा किन्तु उन्होंने अपनी ननद से कुछ कहा नहीं। किन्तु अब ये नित्य का क्रम हो गया। असावरी देवी रोज सभी का भोजन खा जाती थी। अब तो पार्वती को समझ नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें? आखिरकार उन्होंने ही महादेव से ननद की कामना की थी और जब उन्होंने उनकी इच्छा पूर्ण कर दी है तो अब उनकी शिकायत कैसे करें? 
एक दिन दोनों कैलाश में बैठी हँसी मजाक कर रही थी कि मजाक-मजाक में ही असावरी देवी ने माता पार्वती को अपने पैरों की दरारों में छिपा लिया। वहाँ देवी पार्वती का दम घुटने लगा किन्तु वे उनकी दरारों से निकल ना सकीं। उन्होंने बहुत कहा किन्तु असावरी देवी ने उन्हें अपनी पकड़ से मुक्त नहीं किया। जब बहुत समय तक महादेव ने उन्हें कैलाश पर नहीं देखा तो वे असावरी देवी के पर आये और उन्होंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने पार्वती को देखा है? इसपर वे साफ़ मुकर गयी कि उन्होंने उन्हें नहीं देखा है। शिव से क्या छिपा था। उन्हें तुरंत पता चल गया कि पार्वती असावरी देवी के पैरों की दरारों में छिपी हैं। उन्होंने असावरी देवी को इस कृत्य के लिए डांटा और तब उन्होंने हँसते हुए अपना पैर जोर से पटका जिससे देवी पार्वती नीचे आ गिरीं।

अब तो माता पार्वती को बहुत क्रोध आया और उन्होंने भगवान शिव से इस संकट से मुक्ति का उपाय पूछा। तब भगवान शिव ने हँसते हुए कहा कि उन्होंने तो पहले ही पूछा था कि उनकी अपनी ननद से पटेगी या नहीं पर उन्होंने ही उनकी बात नहीं मानी। तब देवी पार्वती ने अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। इसके बाद महादेव ने भी रोज-रोज की इस खटपट से बचने के लिए असावरी देवी को कैलाश से दूर जाकर तप करने को कहा और उन्हें स-सम्मान वहाँ से विदा किया। शायद तभी से ननद और भाभी की नोक-झोंक चलती आ रही है।

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